Tuesday, June 22, 2021

ठंड से ठुतुरते भिखारी के पास DSP पहुंचे तो पता चला वह उनके ही बैच का ऑफिसर हैं, वह एक शार्प शूटर भी रह चुके हैं!

एक भिखारी को देखकर हम सभी बस यही समझते हैं कि वह एक भिखारी है। हम सभी यह भूल जाते हैं कि वह भी एक इंसान है। उसका भी जन्म हम और आप जैसे ही हुआ है। उसका भी अपना एक परिवार होगा। अगर कोई भिखारी हमसे कुछ मांगता है, तब कुछ लोग उसके मदद कर भी देते हैं, तो वहीं कुछ लोग उसके साथ ऐसा व्यवहार करते हैं जैसे उसे अनदेखा कर वहां से चले जाते हैं। क्या हमसब ने यह कभी सोचा है कि आखिर उसके साथ ऐसा क्या हुआ की उसकी ऐसी हालत बन गई? कोई भी इन्सान अपनी मर्जी से भीख नहीं मांगता, उसकी कुछ ना कुछ मज़बूरी होती है। जी हां आज की हमारी कहानी एक ऐसे ही भिखारी की है जो कभी एक अधिकारी हुआ करता था।

आइए जानते हैं, इनकी पूरी कहानी

अक्सर हम एक भिखारी को देखकर यह सोचते है कि वह एक भिखारी ही तो है। पर अगर वह भिखारी एक अधिकारी निकले तो इस बात पर यकीन करना थोड़ा मुश्किल है, क्योंकि ऐसी कहानी हम फिल्मों में ही देखते और सुनते आ रहे हैं, लेकिन यह कहानी एक सच्ची घटना है। यह कहानी मधयप्रदेश के ग्वालियर की है। जहां एक डीएसपी (DSP) ने ठंड से कांपते हुए एक भिखारी को देखा तो अपनी गाड़ी रोक उसके पास गए, तो देखा कि वह भिखारी असल में एक ऑफिसर है।

ख़बरों की माने तो ग्वालियर उपचुनाव की मतगणना के बाद डीएसपी (DSP) रत्नेश सिंह तोमर और विजय सिंह भदौरिया झांसी रोड से निकल रहे थे, तभी दोनों ने वाटिका के फुटपाथ पर सड़क के किनारे एक आधे उम्र के भिखारी को देखा जो ठंड के कारण कांप रहा था। उन दोनों ने अपनी गाड़ी रोक कर उस भिखारी की मदद के लिए गए। रत्नेश ने अपने जूते और DSP विजय सिंह ने अपनी जैकेट उस भिखारी को दिए। फिर दोनों ने उस भिखारी से बात- चीत करना शुरू किए। उसके बाद वह दोनों आश्चर्यचकित रह गए क्योंकि वह भिखारी कोई और नहीं बल्कि उन्ही के बैच का एक ऑफिसर निकला।

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लगभग 10 साल से लापता थे

दरसअल उस भिखारी का नाम मनीष मिश्रा है, जो 10 साल पहले एक पुलिस अफ़सर थे। पिछले दस वर्षों से वह ऐसे ही फुटपाथ पर लावारिस जैसे घूम रहे हैं। उनके बारे में देखा जाए तो वह एक अचूक निशानेबाज भी थे। सन् 1999 में उन्होंने पुलिस की नौकरी की थी। उसके बाद वह एमपी (MP) के अलग-अलग थानों में थानेदार के रूप में पदस्थ रहे। साल 2005 तक उन्होनें पुलिस की नौकरी की। लास्ट समय वह दतिया में बतौर थाना प्रभारी के रूप में पोस्टेड थे, लेकिन उनकी मानसिक स्थिति धीरे-धीरे ख़राब होने लगी थी।

घरवालों ने छोड़ा साथ

उनके मानसिक स्थिति ख़राब होने के कारण उनके परिवार वालों ने उनसे परेशान होकर उन्हें बहुत जगह इलाज के लिए ले गए, लेकिन एक दिन वह परिवारवालों से छुप कर भाग गए। उन्हें बहुत जगह ढूंढे लेकिन उनका कहीं पता नहीं चल पाया। उसके बाद उनकी पत्नी ने भी उन्हें तलाक दे दिया। मनीष ने कि मानसिक स्थिति ज्यादा ख़राब हो गई और वह भीख मांगने लगे।

DSP दोस्तों ने कराया इलाज

मनीष के दोनों साथियों ने बताया कि जब वह उनके साथ साल 1999 में पुलिस सब इंस्पेक्टर की पोस्ट पर भर्ती हुए थे। तब उन्होंने यह कभी नहीं सोचा था कि मनीष से वह इस हालत में मिलेंगे। फिर दोनों ने उनसे बीते दिनों की बात करने की कोशिश की और उन्हें अपने साथ ले जाने की बात कही। पर मनीष उनके साथ जाने को तैयार नहीं हुए। उसके बाद दोनों ने मिलकर उन्हें एक समाजसेवी संस्था में भिजवाया। वहां उनका इलाज शुरू हुआ।

मनीष के भाई थानेदार हैं, उनके पिता और चाचा एसएसपी के पद से रिटायर हुए हैं। उनके बहन किसी दुतावास में अच्छे पद पर नियुक्त है और उनकी पत्नी भी न्यायिक विभाग में कार्यरत हैं। परिवार के होने के बावजूद भी दोस्तों ने उनका इलाज फिर से शुरु करवाया हैं।

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