Tuesday, June 22, 2021

80 साल की वृद्ध माँ जिन्हें दोनों बेटों ने छोड़ दिया, सड़क किनारे मात्र 20 रुपये में खिलाती हैं रोटी सब्जी। पढ़े पूरी कहानी

माँ शब्द सुनते ही मन को शुकुन मिलता है। कहते है एक संतान भले ही माँ को छोड़ दे परन्तु एक माँ कभी भी अपने संतान को नहीं छोड़ सकती। माँ के ममता का मोल इस संसार में कोई नहीं दे सकता। एक माँ अपने संतान की इक्छा पूरा करने के लिए कुछ भी कर सकती है। लेकिन वही बच्चे जब बड़े हो जाते है तो माँ-बाप को बेसहारा छोड़ देते है। ना जाने कितने माँ-बाप को वृद्धाश्रम छोड़ दिया जाता है या फिर ऐसे ही सड़को पर। कहते है जो बच्चा अपने माँ-बाप का नहीं हो सकता वह दुनियां में किसी का भी नहीं हो सकता। आज हम एक ऐसे ही माँ की कहानी आपके साथ साझा करने जा रहे है, जिनके दोनों बेटे उन्हें सड़कों पर ऐसे ही बेसहारा छोड़ दिया।

बुढ़ापे में बच्चों ने सड़क पर बेसहारा छोड़ दिया

एक 80 साल की वृद्ध महिला जिसे घर में रह कर आराम करना चाहिए। जिस उम्र में उनके बच्चों को उनका पूरा ध्यान रखना चाहिए। उस उम्र में उन्हें सड़कों पर बेसहारा छोड़ दिया जाता है। यह सोच कर ही बहुत दुःख होता है कि कोई इतना भी स्वार्थी कैसे हो सकता है। माँ-बाप अपने संतान को पाल-पोषकर उस लायक बनाते है कि वह दुनियां में अपना एक अलग पहचान बना सके। परन्तु जब वही माता-पिता की देखभाल करने का समय आता है, तब वही संतान उन्हें बेसहारा छोड़ देते है। क्या उनके ह्रदय में अपने माता-पिता के लिए इतनी भी जगह नहीं होती है कि वह उन्हें रहने के लिए जगह और खाने के लिए भोजन दे सके।

अपना पेट भरने के लिए सड़क किनारें दुसरो को मात्र 20 रू. में कराती है भोजन

80 वर्ष की एक वृद्ध औरत, जिसे इस उम्र में उनके बच्चों को उनका सहारा बनना चाहिए उन्हें सड़कों के किनारे अपनी पेट भरने के लिए दूसरों को खाना खिलाना पड़ता है। जी हाँ एक ऐसी माँ जिनके दो बेटे होने के बावजूद भी उन्हें सड़कों के किनारे मात्र 20रू. में लोगों को भोजन खिलाना पड़ता है।

एक माँ जो आगरा के सड़क के किनारे लोगों को रोटी बनाकर खिलाती है, इसलिए लोग उन्हें रोटी वाली अम्मा कहते है। उनका नाम भगवान देवी है। वह लोगों को मात्र 20रू. में रोटी-सब्जी और चावल-दाल खिलाती हैं। उनके पति का देहांत हो चुका है। वैसे तो अम्मा के दो बेटे हैं,परन्तु दोनों में से कोई उन्हें अपने साथ नहीं रखना चाहता। बेटों के नहीं रखने की वजह से वह सड़क किनारे दूसरों को भोजन कराती हैं ताकि उनका जीवन व्यतीत हो सके।

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लॉकडाउन में काम बंद होने के कारण बहुत परेशान हो गयी थी अम्मा

करोना काल के दौरान अम्मा का काम-काज सात महीने तक बंद पर गया। वह लगभग 14-15 वर्षों से यह काम कर रही है। इनके पास भोजन करने ज्यादातर मजदूर और रिक्शे वाले आते थे। जिसकी वजह से लॉकडाउन के दौरान ग्राहकों की संख्या बहुत ज्यादा कम हो गई। अम्मा के काम बंद होने के कारण वह बहुत परेशान रहती हैं और उनका जीवन बहुत कष्टमय हो गया है।

Roti wali amma

अगर मुझे एक दुकान मिल जाता तो मैं अच्छे से अपना गुजारा कर लेती: रोटी वाली अम्मा

रोटी वाली अम्मा कहती है कि सड़क किनारे बैठने से मुझे कई बार हटाया भी गया है। कोई मेरे मदद के लिए आगे नहीं आता आखिर मैं कहा जाऊ और क्या करू। अगर मुझे एक दुकान मिल जाती तो मैं अच्छे से अपना गुजारा कर लेती।

एक माँ की ऐसी दुःखमयी कहानी सुन बहुत दुःख होता है। ऐसी ना जाने कितनी और भी माएं है, जिनके पूरे परिवार होने के बावजूद भी उन्हें अपना जीवन ऐसे ही व्ययतीत करना पड़ता है।

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