Tuesday, June 22, 2021

बचपन मे ही पिता का निधन हो गया,आज SDM बनकर अनेकों तरीकों से लोगों की मदद करती हैं

कहते है मंजिल तभी मिलती है, जब व्यक्ति के अंदर कुछ कर गुजरने का हौसला हो। दुनियां में ऐसे कितने लोग होंगे जो बहुत कुछ कर सकते है लेकिन वह अपने परिस्थितियों से घबरा जाते है और हार मान लेते है। अक्सर एक सफल व्यक्ति की कहानी से हमें यह सिखने को मिलता है कि बिना संघर्ष के हम अपने सपनों को नहीं जी सकते है। आज हम आपको एक ऐसी लड़की की कहानी बताने जा रहे है जिनके सर से पिता का साया बचपन में ही छीन गया। फिर भी वह अपनी हिम्मत और हौसलों से देश भर में अपनी एक अलग पहचान बनाई।

आइये जानते है RAS रीना छींपा की संघर्ष भरी कहानी

रीना छींपा जिनके सर से बचपन में ही पिता का साया छीन गया। फिर भी इन्होंने अपने सपनों को पूरा किया। बचपन से वह ना जाने कितने संघर्षों को झेलते हुए RAS बनने का सफर पूरा किया। आज वह सरदार शहर में अपने उपखण्ड ऑफिसर के पद पर तैनात है। इस करोना काल में वह वहाँ के लोगों का मदद कर रही है। वहाँ वह लोगों को पहले तो प्यार से समझाती है और जो नहीं समझता है उनके लिए वह काफ़ी सख्त भी रहती है।

बुलंदशहर की बनी रक्षक

बुलंदशहर में जब 1अप्रैल को करोना संक्रमितों की संख्या सात हो गई, तब यहां ही नहीं बल्कि बीकानेर संभाग के सभी जगहों पर भगदड़ मच गया। यहां जितने करोना संक्रमित थे, वह सभी दिल्ली में हुए जमात से आये हुए थे। इसके बाद यहां कर्फ्यू लगाने के लिए प्रशासन ने आदेश दिया। SDM रीना छींपा इस दौरान वहाँ के सभी जरूरत मंद लोगों के लिए राशन सामाग्री उनके घर तक पहुंचाई। इनका एक दो वर्ष का बेटा भी है लेकिन इन्होंने अपने बेटे की परवाह ना करते हुए लोगों की मदद की और साथ ही प्रवासी मजदूरों के घर- घर जाकर राशन समाग्री पहुंचाया।

प्रेरित हुए भामाशाह

करोना काल के इस संकट की घरी में सबसे ज्यादा दिक्ततों का सामना गरीब मजदूर को करना पड़ा, जो प्रतिदिन मेहनत करके कमाते है। वेलोग भूखे ना सोये इसलिए उन्होंने सबसे पहले भामाशाहों को प्रेरित किया। भामाशाहों ने भी इनकी ही वजह से जरूरत मंद लोगों की मदद की। चूरू जिले में आज तक जितने भी दान हुए है, वह सभी भामाशाहों के द्वारा ही किया गया हैं। इनके दिए गए दानों की वजह से ही सरदारशहर में करोना काल के समय लोगों का जीवन आसानी से गुजर सका।

आसान नहीं था RAS बनने का सफर

रीना छींपा के पिता का नाम जगदीश प्रसाद था। वह एक किसान थे। रीना जब 10 साल की थी, तभी इनके पिता का देहांत हो गया। उस वक़्त वह कक्षा छः में थी। पिता के नहीं रहने से वह दुःखी तो थी लेकिन इन्होंने अपने हिम्मत को कभी कम नहीं होने दिया और जीवन में पढ़-लिखकर अपने पिता का नाम रौशन करने को सोचा। इनका पूरा पढ़ाई सरकारी स्कूल और कॉलेज से हुआ। इनके बारे में यह जान कर सभी हैरान हो जाते हैं कि, इन्होंने अपनी पढ़ाई के लिए कोई कोचिंग ज्वाइन नहीं किया था। RAS की तैयारी भी इन्होंने अपने घर से ही पूरी की। अपने बीएड की पढ़ाई के दौरान वह अपने क्लास में टॉपर रही थी। इतना ही नहीं इन्हें राष्ट्रपति और राज्यपाल दोनों ने सम्मनित भी किया है। इन्होंने RAS बनने से पूर्व 4 सरकारी जॉब को छोड़ दिया, क्योंकि इनका सपना केवल RAS बनना था।

रीना छींपा की यह सफलता उन सभी लोगों के लिए एक प्रेरणा हैं, जो अपनी परिस्थितियों से हार मान लेते है। रीना ने अपने सपनों के साथ-साथ अपनी पिता का भी नाम रौशन किया।

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