Tuesday, August 3, 2021

डॉक्टर चाची ने गरीब भतीजे को हॉस्पिटल में करायी UPSC की तैयारी, भतीजा बना IAS

आज हमारे देश में कई ऐसे बच्चे हैं। जो अपने सपने को पुरा करने के लिए मुश्किल हालातों से लड़ते हैं। लेकिन जिस बच्चे के अंदर अपने लक्ष्य तक पहुंचने का जज्बा हो उन्हें सफलता जरूर मिलती है। ऐसे ही कहानी है। हिमांशु जैन कि जो मिडिल क्लास फैमिली से हैं। इन्होंने यूपीएससी परीक्षा में टॉप किया और आईएएस अधिकारी बन अपने सपने को साकार किया।

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हिमांशु एक मध्यमवर्गीय परिवार से आते है

हिमांशु जैन हरियाणा के जींद के रहने वाले हैं। यह एक मिडिल क्लास फैमिली से हैं। इनके पिता पवन जैन एक दुकान चलाते हैं। हिमांशु जैन की प्रारंभिक शिक्षा हरियाणा के जींद से हुई। हिमांशु के घर वाले बताते हैं की जब हिमांशु स्कूल में पढ़ाई करते थे तब इनके स्कूल में डिस्ट्रिक कलेक्टर चेकिंग करने आए थे। डिस्ट्रिक कलेक्टर के आने से पहले स्कूल में काफी साफ- सफाई हुई। यह देखकर हिमांशु ने अपने टीचर से पूछा कि डिस्ट्रिक कलेक्टर कौन होता है। और कैसे बनता है। तो टीचर ने हिमांशु को बताया। उसी समय से हिमांशु ने ठान लिया कि वह भी कलेक्टर बनाएंगे। और आज इन्होंने अपने सपने को साकार कर लिया।

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2016 की रिजल्ट में आया 44वां रैंक

हिमांशु जैन साल 2015 में यूपीएससी की परीक्षा दी थी। इन्हें खुद पर पूरा यकीन था कि वो इस परीक्षा में पास कर लेंगे। और सलेक्शन हो जाएगा। साल 2016 में यूपीएससी का रिजल्ट आया तो हिमांशु ने पूरे देश में 44 वीं रैंक हासिल किए। एक छोटे से गांव और मिडिल क्लास फैमिली से निकाल कर और कम साधनों के बावजूद हिमांशु ने यूपीएससी परीक्षा में टॉप कर अपने परिवार को और अपने गांव को गौरवान्वित किया।

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अपनी सफलता का पूरा श्रेय अपनी डॉ. चाची को देते है

हिमांशु जैन सफलता का पूरा श्रेय अपनी डॉ. चाची को देती हैं। हिमांशु बताते हैं कि यूपीएससी परीक्षा की तैयारी करने में उनकी चाची ने काफी मदद की और पढ़ने के लिए प्रेरित ही नहीं बल्कि हमें पढ़ाया भी। हिमांशु की चाची पेशे से डॉक्टर थी। वे बताते हैं कि जब चाची खाली समय में रहती थी तब हमें हॉस्पिटल में बुला लेती थी और पढ़ती थी। चाची ने मेरा खूब हौसला बढ़ाया और वे कहती थी कि तुम इस परीक्षा में जरूर सफल होगे।

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अपने पढ़ाई के दौरान एक NGO से भी जुड़े थे हिमांशु

हिमांशु अपने पढ़ाई करने के दौरान एक एनजीओ से जुड़े थे। जो बच्चे अपने हॉस्टल में समान छोड़कर चले जाते थे। उस समान को हिमांशु अपने एनजीओ की मदद से जरूरतमंदों तक पहुंचते थे। हिमांशु बताते हैं कि इस काम को करने में मुझे काफी सुकून मिलता था। और हमारे इस प्रयास से जरूरतमंद परिवारों को जरूरत पूरी हो जाती थी।

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