Wednesday, September 22, 2021

अमेरिका से लौटकर पत्तल बनाना शुरू किया, इस साल कर चुके हैं 15 लाख का बिजनेस। देखें वीडियो

आज हमारे देश में शादियों में पार्टीयों में या फिर किसी भी कार्यक्रम में लोग प्लास्टिक या थर्मोकोल का प्लेट्स कटोरी का उपयोग करते हैं। प्लास्टिक या थर्मोकोल के प्लेट्स या कटोरी के उपयोग से ना केवल पर्यावरण दुसित होता है, यह हमारे स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक होती है। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इको- फ्रेंडली पत्तल और प्लेट्स बनाकर हम सभी तक पहुंचा रहे हैं। इको- फ्रेंडली पत्तल से पर्यावरण भी दूसित नहीं होता है। और हमारे सवास्थ के लिए भी अच्छा है।

माधवी और वेणुगोपाल हैदराबाद के रहने वाले हैं। माधवी फार्मेसी और जेनेटिक्स में मास्टर्स किए हुए हैं। और वेणुगोपाल मैकेनिकल इंजीनियर किए हुए हैं। ये दोनों कपल साल 2003 से पहले नौकरी के लिए मलेशिया, बैंकॉक, सिंगापुर और अमेरिका में रहा करते थे। लेकिन जब इनके बच्चे बड़े होने लगे तो इन्होंने सोचा कि अगर बच्चों की परवरिश विदेश में हुई तो ये भारतीय संस्कृति से नहीं जुड़ पाएंगे। इसलिए इन्होंने अपने देश भारत वापस लौटने का मन बना लिया। और साल 2003 में वे दोनों हैदराबाद में आकर रहने लगे।

make traditional leaf plate

जब ये दोनों हैदराबाद में रहने लगे तो माधवी ने देखा कि उनके घर के बाहर प्लास्टिक की प्लेट्स और कटोरी का ढेर लगा हुआ है। और कुछ गाय इस ढेर में से अपना भोजन ढूंढ़ कर खा रही थी। लेकिन माधवी को कुछ दिनों बाद पता चला कि जो गाय उस ढेर में से भोजन खा रही थी तो भोजन के साथ- साथ प्लास्टिक की प्लेट्स भी खा ली थी जिसकी बजह से उस गाय की मृत्यु हो गई। यह देखकर माधवी को बहुत दुख हुआ। इसके बाद माधवी ने मन बना लिया कि वे इको- फ्रेंडली प्लेट्स और कटोरी बनाकर लोगों तक पहुंचाएंगे।

माधवी बताती हैं कि अमेरिका से लौटने के बाद वे सेविंग्स से तेलंगाना के सिद्घिपेट में 25 एकड़ जमीन खरीदी थी। इस जमीन पर इन्होंने 30 से भी ज्यादा किस्मों के फलों के 12 हजार से भी ज्यादा पेड़ लगाए हैं। और वे अपने खेतों में पलाश के भी पेड़ लगाए हैं। माधवी बताते हैं कि एक दिन मेरी मां ने हमें बताया कि पलाश के पत्तों से पहले पत्तल बनाए जाते थे। अपनी मां की बातों को सुनकर मैंने और वेणुगोपाल ने दोनों मिलकर पलाश के कुछ पत्ते इकट्ठा कर उससे प्लेट्स बनाने लगे। और इसमें हमें सफलता भी मिली। परन्तु काफी छोटे बने।

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Madhavi

वेणुगोपाल बताते हैं कि मुझे एक फेसबुक ग्रुप से पता चला कि ओडिसा में आदिवासी समुदाय के लोग अभी भी साल और सियाली के पत्तों से पत्तल बनाते हैं और वे उसको खलीपत्र कहते हैं। तो मुझे समझ में आया कि इको- फ्रेंडली पत्तल भी बनाते हैं। लेकिन इसका उपयोग काफी कम हो गया है। इसके बाद वेणुगोपाल ने कई नैचुरोपैथ से इस बारे में बात किया तो उन्होंने बताया कि पलाश या साल के पत्तल पर खाना खाने से पर्यावरण ही नहीं बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी अच्छा होता है। और जब इस पत्तल पर खाना परोसा जाता है तो भोजन में एक प्राकृतिक स्वाद भी भरता है। और इससे कीड़े- मकोड़े भी भाग जाते हैं।

वेणुगोपाल को इस इको- फ्रेंडली पत्तल के बारे में जानने के बाद इन्होंने ओडिसा के ऐसे सप्लायर से संपर्क किया जो आदिवासी समुदाय के लिए काम करते थे। इसके बाद वेणुगोपाल ने ओडिसा से सियालि, साल और तेलंगाना से पलाश के पत्ते मंगवाते और फिलहाल अपने खेतों पर ही इन पत्तों से लीफ प्लेट बनाने की यूनिट लगाई है जहां वे पत्तल और कटोरी बनाते है।

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माधवी और वेणुगोपाल ने इको- फ्रेंडली प्लेट्स की मार्केटिंग अपने सोसायटी से ही शुरू की। इनके दोस्त और रिश्तेदार ने इनके बनाए हुए इको- फ्रेंडली प्लेट्स का इस्तेमाल किया। और इन लोगों ने सोशल मीडिया पर इनके बारे में लिखा। जिससे इन्हे एक पहचान मिलने लगी। वेणुगोपाल बताते हैं कि हमारे प्रोडक्ट्स भारत के अलावा अमेरिका और जर्मनी तक जा रहे हैं। ये बताते हैं की भारत से ज्यादा विदेशों में लोग इस इको- फ्रेंडली प्लेट्स का उपयोग करते हैं। और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक हैं।

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माधवी और वेणुगोपाल कहते हैं की हमने कभी भी इसके बारे में नहीं सोचा था। लेकिन जब हमें लगा कि वो विस्त्रकु के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण में अपना योगदान दे सकते हैं। तो हमे इसी क्षेत्र में आगे बढ़ने का निर्णय लिया। शुरुआत में हमे यूनिट सेटअप तैयार करने में काफी परेशानी आई। परन्तु हमने कभी हार नहीं मानी और आगे बढ़ते रहे।

वेणुगोपाल बताते हैं कि हमे पहले साल में करीब 3 लाख रुपए का बिजनेस हुआ। लेकिन इस फैनेंसियाल ईयर में हम 20 लाख रुपए तक बिजनेस कर लेंगे। फिलहाल हमने 15 लाख तक बिजनेस कर लिया है। और पिछले महीने हमें यूएस से एक बड़ा ऑडर मिला और एक कंटेनर माल हमने यूएस भेज दिया है।

make traditional leaf plate 1

माधवी और वेणुगोपाल के यूनिट में गांव की 7 लड़कियां काम करती है। इस यूनिट में हर दिन करीब 7 हजार लीफ प्लेट्स और कटोरियां बनाई जाती है।

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